अलविदा बशीर बद्र साहब !
रिपोर्ट - प्रेम शंकर पाण्डेय
उर्दू अदब और शेर ओ शायरी का तीसरा स्तंभ भी कल(28मई) गिर गया, और कल बशीर बद्र साहब 92 साल की उम्र में इस फानी दुनिया को अलविदा कह गये।
बशीर बद्र साहब वर्षों से बिस्तर पर थे और डिमेंशिया और उम्र से जुड़ी बीमारियों से पीड़ित थे। उनकी याददाश्त काफी कमजोर हो गई थी और वे सार्वजनिक जीवन से दूर हो गए थे। आख़िरी वर्षों में उन्हें अपने मुशायरों और शेर तक याद नहीं रहते थे, और बोलने में भी कठिनाई होती थी
डाक्टर राहत इंदौरी, मुनव्वर राना के बाद बशीर बद्र का जाना हमारे सामने उर्दू अदब के चार स्तंभों में से तीन का गिर जाना है, एक बचे स्तंभ "वसीम बरेलवी साहब" को अल्लाह लंबी ज़िन्दगी दे।
15 फरवरी 1935 को उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में जन्मे डॉ. बशीर बद्र का वास्तविक नाम 'सैयद मोहम्मद बशीर' था। हालांकि, उनका पैतृक स्थान फैजाबाद (अयोध्या) जिले का मौज़ा बकिया था।
उनके पिता सैयद मोहम्मद नज़ीर पुलिस विभाग में कार्यरत थे और कानपुर इटावा में पोस्टेड थे जहां बशीर बद्र की शुरुआती शिक्षा हुई।
बशीर बद्र ने कक्षा तीन तक कानपुर के "हलीम मुस्लिम कॉलेज" में शिक्षा प्राप्त की जिसके बाद उनके पिता का तबादला इटावा हो गया जहां "मुहम्मद सिद्दीक़ इस्लामिया कॉलेज" से इन्होंने हाई स्कूल का इम्तिहान पास किया।
बशीर साहब बचपन से ही शायराना मिज़ाज में रमे हुए थे और छोटी उम्र से शायरी लिखने लगे और उन्होंने अपनी ज़िंदगी का पहला शेर 6 साल की उम्र में लिखा
"तेरे इश्क़ में मैं मरा जा रहा हूँ
हवा चल रही है उड़ा जा रहा हूँ"
इतनी छोटी उम्र में लिखे इस शेर पर उनके वालिद बहुत नाराज़ हुए थे , उन्होंने बशीर बद्र की पिटाई की और शायरी करने से मना भी कर दिया।
इटावा में रहते हुए ही जब वह कक्षा 7 में थे तब उनकी पहली ग़ज़ल नियाज़ फतेहपुरी की प्रसिद्ध पत्रिका "निगार" (लखनऊ) में प्रकाशित हुई और बशीर बद्र पूरे इटावा में मशहूर हो गए और इटावा के साहित्यिक मंडलियों में खलबली मच गई, लोग हैरान थे कि एक स्कूली बच्चा ऐसा गहरा शेर कैसे लिख सकता है ?
हाई स्कूल के बाद ही बशीर बद्र साहब के वालिद मोहम्मद नज़ीर का इंतकाल हो गया और बशीर बद्र को शिक्षा का क्रम छोड़ कर 85 रूपये मासिक पर पुलिस की नौकरी करनी पड़ी।
वालिद की मौत के बाद घर की ज़िम्मेदारियाँ इन्हीं के सर पर थीं। उनका रिश्ता वालिद की ज़िंदगी में ही अपनी कज़िन "क़मर जहां" से तय हो गया था और पुलिस की नौकरी के दौरान ही उनकी शादी हो गई।
20 साल की उम्र को पहुंचे पहुंचते उनकी ग़ज़लें हिंदुस्तान और पाकिस्तान की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगी थीं और साहित्य में उनकी पहचान बन गई।
शैक्षिक क्रम टूट जाने के कई साल बाद उन्होंने नए सिरे से अपनी शैक्षिक योग्यता बढ़ाने का फ़ैसला किया और जामिया अलीगढ़ के "अदीब माहिर और अदीब कामिल" परीक्षाएं पास करने के बाद अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से BA, MA और PhD की और वहीं उन्हें पढ़ाने की नौकरी मिल गई फिर वह वहीं उर्दू पढ़ाने लगे।
इसके बाद वे मेरठ कॉलेज में उर्दू विभाग के प्रमुख रहे और लगभग 17 साल तक अध्यापन किया और यहीं से उन्हें शोहरत मिलनी शुरू हो गई।
2 जुलाई 1972 को जब भारत और पाकिस्तान के बीच शिमला समझौता हुआ तो उस दौरान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने इंदिरा गांधी को बशीर बद्र साहब का एक मशहूर शेर सुनाया ...
दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा ना हो
मई 1984 में जब एक मुशायरे के लिए बशीर बद्र पाकिस्तान गए हुए थे तब उनकी बीवी "क़मर जहां" का देहांत हो गया और हिन्दू बहुल मुहल्ले "शास्त्री नगर" में रहने वाले हिंदुओं ने उनका अंतिम संस्कार इस्लामिक तौर तरीके से किया।
1986 में उन्होंने भोपाल की डाक्टर राहत सुलतान से शादी कर ली और कुछ दिनों बाद वहीं स्थाई रूप से भोपाल ही बस गए।
हिंदुओं द्वारा उनकी पत्नी क़मर जहां का इस्लामिक विधि विधान से अंतिम संस्कार करने के ठीक तीन साल बाद 1987 के मेरठ दंगों में जब मलियाना और हाशिमपुरा हो रहा था तब उन्हीं लोगों ने "शास्त्री नगर" में बशीर बद्र के उसी घर को लूट कर जला दिया जिसमें उनकी लिखी तमाम शुरुआती रचनाएं जल कर राख हो गयीं।
"निगार" में छपी उस शुरुआती रचना के बाद की उनकी लगभग सभी प्रारंभिक गज़लें 1987 के मेरठ सांप्रदायिक दंगों में नष्ट हो गई।
बशीर बद्र उस वक्त दिल्ली में एक मुशायरे में गए हुए थे जब दंगों के दौरान उनका घर भीड़ द्वारा आग के हवाले कर दिया गया। उस वक्त उनका बेटा नुसरत बद्र घर पर ही थे और किसी तरह बच कर निकल गये।
1987 मेरठ दंगों में उनका घर ही नहीं, उनकी कई अप्रकाशित कविताएँ और किताबें भी जल गई थीं। इसके बाद वे लंबे समय तक सदमे में रहे और लिखना लगभग छोड़ दिया। फिर उनकी पत्नी डॉ. राहत बद्र ने उन्हें फिर से लिखने के लिए प्रेरित किया।
और फिर उन्होंने लिखा
"लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में”
उनकी शायरी की सबसे बड़ी खासियत यह मानी जाती है कि उन्होंने कठिन उर्दू के बजाय रोज़मर्रा की आसान भाषा इस्तेमाल की, इसलिए आम लोग भी उन्हें बहुत पसंद करते थे... जैसे
“कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो।”
“पत्थर मुझे कहता है मेरा चाहने वाला
मैं मोम हूँ उसने मुझे छू कर नहीं देखा।”
“कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता।”
उनके पुत्र नुसरत बद्र फिल्मों के प्रसिद्ध गीतकार थे और "देवदास" फिल्म का गाना "डोला रे डोला रे" और "मार डाला” उन्होंने ही लिखा था।
लंबे समय तक बीमार रहने के नुसरत बद्र का इंतकाल 24 जनवरी 2020 को हुआ तो बशीर बद्र साहब और टूट गये और कल अलविदा कह गये तो उनका लिखा यह शेर बस यूं ही याद आ गया..
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।”
अलविदा बशीर बद्र साहब, अल्लाह मग़फिरत फ़रमाए...
साभार
मो. जाहिद ✍️
admin