रोजा इंसान को सब्र ,संयम व ईशभय सिखाता है - डा. नज्मुस्साकिब अब्बासी नदवी

रोजा  इंसान को सब्र ,संयम व ईशभय  सिखाता  है - डा. नज्मुस्साकिब अब्बासी नदवी

रिपोर्ट - प्रेम शंकर पाण्डेय

रमज़ानः इंसानियत का पैग़ाम

रमज़ान का महीना चल रहा है, दुनिया भर में इसको लेकर श्रद्धा का बादल उमड़ घूमड़ रहा है, रमज़ान के बारे में मशहूर है कि रमज़ान की फ़ज़ीलत (महिमा) आध्यात्मिक और शारीरिक दोनों है, जिसमें अल्लाह की रहमत, गुनाहों की माफी, जन्नत के दरवाजों का खुलना और शैतानों का क़ैद होना शामिल है, साथ ही यह स्वास्थ्य लाभ जैसे पाचन सुधार, कोलेस्ट्रॉल में कमी और मानसिक स्पष्टता भी देता है, क्योंकि यह ईमान को मज़बूत करने, इबादत को बढ़ाने और अल्लाह के करीब आने का महीना है।

यह महीना अल्लाह की रहमतों और नेमतों से भरा होता है, हर जगह उसकी बरकते छाई रहती हैं। इस महीने में सच्चे दिल से तौबा करने वालों के पिछले सब गुनाह माफ़ किए जाते है और जहन्नुम से आज़ादी मिलती है। रमज़ान की पहली रात से जन्नत के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं और जहन्नम के दरवाजे बंद कर दिए जाते है। इस महीने में दुष्ट शैतानों को जंजीरों में जकड़ दिया जाता है, जिससे बुराई बहुत कम हो जाती है।

रमज़ान इस्लाम का सबसे मुक़द्दस और बरकतों से भरा महीना है। यह महीना रहमत, मग़फ़िरत और निजात का पैग़ाम लेकर आता है। अल्लाह तआला ने इस महीने को तमाम महीनों से बेहतर बनाया है और इसमें इबादत का सवाब कई गुना बढ़ा दिया है।

रमज़ान की सबसे बड़ी बात यह है कि इसी महीने में पवित्र कुरआन अवतरित हुआ। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि रमज़ान वह महीना है जिसमें इंसानियत की रहनुमाई के लिए कुरआन उतारा गया। इसलिए इस महीने में कुरआन की तिलावत, समझना और उस पर अमल करने की ख़ास अहमियत है।

रमज़ान में रोज़ा रखना फ़र्ज़ है। रोज़ा इंसान को सब्र, संयम और तक्वा अर्थात ईशभय सिखाता है। भूख और प्यास की हालत में इंसान ग़रीबों और ज़रूरतमंदों की तकलीफ़ को महसूस करता है, जिससे उसके दिल में रहम और हमदर्दी पैदा होती है। रोज़ा सिर्फ़ खाने-पीने से ही नहीं रोकता बल्कि बुरी बातों, ग़लत कामों और बुरे ख़यालों से बचने का सबक़ भी देता है।

हदीस की किताबों में आया है कि रमज़ान का पहला दस दिन रहमत, दूसरा दस दिन मग़फ़िरत और तीसरा दस दिन जहन्नम से निजात का होता है। इस महीने में अल्लाह अपने बंदों की दुआएँ खासतौर पर कुबूल करता है और गुनाहों को माफ़ करता है।

रमज़ान की आख़िरी रातों में विशेष रात लैलतुल क़द्र आती है, जो हज़ार महीनों से बेहतर है। इस एक रात की इबादत का सवाब पूरी उम्र की इबादत से ज्यादा है। इसलिए मुसलमान इस रात की तलाश में इबादत, दुआ और ज़िक्र में मशगूल रहते हैं।

इसी तरह रमज़ान हमें आपसी मोहब्बत, भाईचारे और बराबरी का पैग़ाम देता है। इफ्तार में सब एक साथ बैठकर खाते हैं, ज़कात और सदक़ा दिया जाता है, जिससे समाज में गरीबों की मदद होती है और आपसी रिश्ते मज़बूत होते हैं।

रमज़ान के रूहानी फायदे तो जगजाहिर है मगर सेहत के लिए भी रोज़ा कई तरह से फायदेमंद है, अगर उसे उसके हक़ के साथ रखा जाए। रोज़ा रखने से पेट को कुछ समय का आराम मिलता है, जिससे पाचन सिस्टम बेहतर होता है। सही खान-पान के साथ रोज़ा अतिरिक्त चर्बी कम करने में सहायक होता है। रोज़ा इंसुलिन सेंसिटिविटी बढ़ा देता है जिससे डायबिटीज़ का खतरा कम होने लगता है। रोज़ा शरीर में जमा हुए टॉक्सिन्स को बाहर निकालने की प्रक्रिया तेज करता है। रोज़ा से कोलेस्ट्रॉल और ब्लड प्रेशर को संतुलित रखने में मदद मिलती है। रोज़ा आत्म-नियंत्रण, मानसिक एकाग्रता और सुकून को बढ़ाता है।

सारांश यह है कि रोज़ा सिर्फ़ भूखे-प्यासे रहने का नाम नहीं, बल्कि आत्मा, शरीर और ईमान को शुद्ध करने, अल्लाह से जुड़ने और जीवन शैली को बेहतर बनाने का एक सुनहरा अवसर है।

लेखक -‌ नज्मुस्साकिब अब्बासी नदवी 

नया सवेरा फाउंडेशन के संस्थापक व सौहार्द फेलोशिप के मेंटर हैं।