गुरु ही मनुष्य को कर्तव्य का बोध कराते है - दास सुमित पाण्डेय
रिपोर्ट - प्रेम शंकर पाण्डेय
श्रद्धा व कृतज्ञता का महापर्व गुरू पूर्णिमा
कासिमाबाद(गाजीपुर)।भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सदैव सर्वोच्च माना गया है। शास्त्रों के अनुसार गुरु वह दिव्य मार्गदर्शक हैं, जो शिष्य को अज्ञान के अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाते हैं। इसी गुरु-परंपरा के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा मनाई जाती है।

गांव पाली निवासी भगवताचार्य दास सुमित पाण्डेय ने संवादाता से बातचीत में बताया कि यह दिन महर्षि वेदव्यास की जयंती के रूप में भी प्रसिद्ध है। वेदों के विभाजन, महाभारत की रचना और पुराणों के संकलन के कारण इसे व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है।
शास्त्रों में कहा गया है 'ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः पूजामूलं गुरोः पदम् मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा।' अर्थात गुरु का स्वरूप ध्यान का विषय है, उनका उपदेश साधना का आधार है और उनकी कृपा ही मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है। भारतीय दर्शन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को मानव जीवन के चार पुरुषार्थ माने गए हैं। इनकी सार्थक प्राप्ति गुरु के मार्गदर्शन के बिना संभव नहीं मानी प्रो. रामनारायण द्विवेदी गई। गुरु ही मनुष्य को कर्तव्य का बोध कराते हैं, संयम, विवेक और सदाचार का मार्ग दिखाते हैं तथा आत्मज्ञान की ओर बढ़ाते हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने श्रीरामचरितमानस में गुरु को अज्ञानरूपी अंधकार का नाश करने वाला बताया है। वहीं भगवान श्रीराम ने माता-पिता और गुरु के प्रति सम्मान को आदर्श जीवन का आधार माना।
आज के समय में गुरु पूर्णिमा केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि शिक्षकों, माता-पिता और जीवन में मार्गदर्शन देने वाले सभी व्यक्तियों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है। नैतिक मूल्यों के क्षरण के इस दौर में यह पर्व हमें संस्कार, अनुशासन, सेवा और आत्मचिंतन का संदेश देता है। जब तक ज्ञान, सत्य और आत्मोन्नति की खोज मानव जीवन का लक्ष्य रहेगी, तब तक गुरु-परंपरा और गुरु पूर्णिमा का महत्व अक्षुण्ण रहेगा। यही इस महान भारतीय पर्व का सनातन संदेश है।
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