प्रेरणाप्रद प्रसंग : बारिश और फकीर
रिपोर्ट - प्रेम शंकर पाण्डेय
धैर्य निरंतरता व विश्वास के साथ प्रयास में सफलता समाहित
अपने बड़ों से मैंने एक कहानी ख़ूब सुनी है कि एक गाँव में एक फ़क़ीर रहता था।उसकी विचित्र ख्याति ये थी कि जब भी गाँव में बारिश देर से होती,लोग उसे बुलाकर कहते, "बाबा! ज़रा नाच दीजिए,बारिश नहीं हो रही है।"
फ़क़ीर मुस्कुराता,उठता और नाचना शुरू कर देता।वह लगातार नाचता रहता और कुछ समय बाद बारिश हो जाती।
वर्षों तक ऐसा होता रहा। इसलिए गाँव वालों का विश्वास और भी गहरा हो गया कि फ़क़ीर के नाचने से ही बारिश होती है।
समय बीता।गाँव के कुछ युवक उच्च शिक्षा प्राप्त करने शहर गए।पढ़-लिखकर वे वैज्ञानिक सोच के साथ वापस लौटे।
उसी वर्ष बरसात के मौसम में बारिश होने में देर हुई।गाँव वालों ने पहले की तरह फ़क़ीर को बुला लिया।यह देखकर उन पढ़े-लिखे युवाओं ने कहा"यह कैसे संभव है? बारिश का संबंध तो प्राकृतिक प्रक्रियाओं से होता है,किसी के नाचने से बारिश थोड़े हो सकती है?अगर नाचने से बारिश होती है तो हमारे नाचने से भी बारिश हो सकती है,फिर युवाओं ने नाचना शुरू किया,आधा घंटा,एक घंटा और फिर दो घंटा,युवा नाचते_नाचते थक गए मगर बारिश न हुई।
गांव वालों ने कहा,देखा! हम कहते न थे कि तुम्हारे नाचने से बारिश न होगी,युवाओं ने जवाब में कहा कि हम भी तो यही कह रहे हैं कि नाचने से बारिश नहीं होती।
लेकिन गाँव वालों ने उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया और फ़क़ीर से नाचने गुज़ारिश की,फ़क़ीर नाचने लगा।एक घंटा बीता,फिर दो घंटा,फिर कई घंटा।यहां तक कि कई दिन बीत गए मगर फ़क़ीर बिना थके लगातार नाचता रहा।अंततः बादल घिर आए और तेज़ बारिश शुरू हो गई।

गाँव वाले खुशी से झूम उठे। पढ़े-लिखे युवक भी हैरान थे। उनमें से एक जिज्ञासु युवक फ़क़ीर के पास गया और विनम्रता से बोला,
बाबा! सच-सच बताइए, आपके नाचने से कैसे बारिश हो गई,जबकि हम नाचे तो बारिश न हुई,ये बारिश कैसे हो जाती है? क्या यह कोई करामत(ईश्वरीय चमत्कार)है?"
फ़क़ीर मुस्कुराया और बोला,नहीं बेटा!दरअसल बात ये है कि तुम *बारिश के लिए नाचे और हम बारिश होने तक नाचे* ये करामत मेरे नाच में नहीं,मेरे धैर्य में है।मैं तब तक नाचता रहता हूँ,जब तक बारिश नहीं हो जाती।"
युवक ने चुप्पी साध ली।उसे समझ में आ गया कि फ़क़ीर यह दावा नहीं करता कि वह बारिश करवाता है बल्कि वह केवल तब तक प्रयास करता रहता है,जब तक ईश्वर_अल्लाह अपना आदेश न दे दे और प्रकृति काम न कर दे।
मुझे याद है कि बचपन में ऐसा ही मेरे गांव रसूलपुर के बच्चे कुछ इस तरह टोटका करते कि दोपहर में अर्ध नग्न होकर वह घर-घर जाते और ये गाते कि *काट कटौती पियरी धोती ए मौला तू पानी दे, हौदी सूखी बैल प्यासा ए मौला तू पानी दे*
घर वाले उनके ऊपर बाल्टी से या लोटा से पानी डालते और वह उस पानी में ज़मीन पर लोटते,संयोगवश उस दिन यदि बारिश हो जाती तो लोग मानते कि बच्चों के इस अमल से बारिश हुई है, जबकि सच्चाई उसके परे थी।
इस कहानी में हमारे लिए एक सबक है कि जीवन में सफलता भी इसी प्रकार मिलती है।मंज़िल उन्हें नहीं मिलती जो थोड़ी-सी कठिनाई देखकर रुक जाते हैं बल्कि उन्हें मिलती है जो धैर्य,निरंतरता और विश्वास के साथ अपने प्रयास जारी रखते हैं।परिणाम कब मिलेगा, यह हमारे हाथ में नहीं होता लेकिन प्रयास करते रहना हमारे हाथ में ज़रूर होता है।इसलिए सफलता के लिए लड़ते रहिए,भिड़ते रहिए,कामयाबी एक न एक दिन आपके सर का ताज ज़रूर बनेगी।
✒️ लेखक डॉ. नजमुस्साकिब अब्बासी नदवी
????यादों की रहगुज़र पुस्तक से साभार
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